Chunnu Ke Do Khargosh | चुन्नू के दो खरगोश

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हिंदी कहानी – चुन्नू के दो खरगोश | Hindi Kahani – Chunnu Ke Do Khargosh

Chunnu Ke Do Khargosh : चुन्नू एक बहुत ही प्यारा और शरारती बच्चा था। उसका सारा ध्यान खेलने-कूदने में लगा रहता था। वह पढ़ाई में भी होशियार था। वह एक गाँव में रहता था।

उसका गाँव उसे बहुत अच्छा लगता था। गाँव के लोगों का जानवरों के प्रति बहुत प्यार था। गाँव में सभी लोग किसी-न-किसी जानवर को अवश्य पालते थे और उसका अच्छे से ख्याल रखते थे। चुन्नू के घर में भी एक प्यारी सी गाय थी। जिसका वह बहुत देख-रेख करता था।

 

चुन्नू के दो खरगोश | Chunnu Ke Do Khargosh Hindi Kahani

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चुन्नू के दो खरगोश | Chunnu Ke Do Khargosh Hindi Kahani



चुन्नू को अनायास ही खरगोश पालने का मन में विचार आया। वह अपने पिताजी से दो खरगोश पालने की जिद्द की। पिताजी उसके जिद्द के आगे घूटने टेक दिए और उसके लिए दो खरगोश ले आए।

पिताजी ने चुन्नू से पूछा – बेटा दो खरगोश क्यों? एक खरगोश क्यों नहीं? इसपर चुन्नू ने बहुत ही मासूमियत से कहा – खरगोश को अकेलापन महसूस नहीं हो और मजे से एक-दुसरे के साथ खेल सके। चुन्नू का जवाब सुनकर पिताजी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेर दिया। चुन्नू खरगोश को पाकर बहुत खुश हो गया।

चुन्नू के गाँव में हर साल किसी-न-किसी त्योहार पर वार्षिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था। इस प्रतियोगिता का आयोजन गाँव के मुखिया के द्वारा किया जाता था। गाँव के लोग बड़े ही चाव से इस प्रतियोगिता में बढ़ – चढ़कर भाग लेते थे।

मगर इसबार की प्रतियोगिता का विषय कुछ अलग ही था। प्रतियोगिता का विषय था – पालतू जानवरों के दौड़ का। गाँव के जिस किसी का भी पालतू जानवर दौड़ता हुआ अपने घर के अन्दर घुस जाएगा, उस जानवर को और उसके मालिक को विजेता घोषित किया जाएगा। यह प्रतियोगिता गाँव के सभी लोगों को कुछ अटपटा और रोमांचपूर्ण लगा।

गाँव के अधिकांश लोग इस प्रतियोगिता में अपने-अपने जानवरों को इसमें हिस्सा दिलवाया। चुन्नू भी  चाहता था की उसका दोनों खरगोश भी इस प्रतियोगिता में भाग ले। वह अपने पिताजी से इस बारे में बात की। पिताजी ने चुन्नू का साथ दिया और उसके दोनों खरगोशों को प्रतियोगिता में हिस्सा दिलवा दिया।

प्रतियोगिता की तैयारी के लिए एक महीने का समय दिया गया। सभी जानवरों के मालिक अपने-अपने तरीके से अपने जानवरों को अभ्यास कराने लगे। कोई व्यक्ति अपने जानवर को खूब अच्छा – अच्छा भोजन कराता ताकि वह दौड़ सके।

कोई अपने जानवर के पैरों में मालिश करता तो कोई अपने जानवर को सिखाता की जिस दिन बहुत सारे जानवर दौड़ लगाएगें उस दिन उसे अपने घर के अन्दर आना है। इस तरह सब अपनी – अपनी तैयारी में लग गए।

दस दिन गुजर गए मगर चुन्नू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपने खरगोशों को तैयारी कराये। वह अपने घर के आँगन में बैठा यही सोच रहा था कि उसका खरगोश खेलते-कूदते घर से बाहर चला गया।

कुछ ही पल में दोनों खरगोश बाहर से भागता हुआ अन्दर छुप गया। चुन्नू बाहर जाकर देखा तो एक कुत्ता दरवाजे पर खड़ा था। वह सब समझ गया कि कुत्ते के डर से वह अन्दर भागा था।

चुन्नू मन में एक विचार कर प्रतियोगिता की तैयारी में लग गया। वह दोनों खरगोशों को रोज प्रतियोगिता स्थल से घर तक दौड़ाता हुआ लाता था। जिससे उसे अपने घर का रास्ता याद हो जाए।

इस तरह एक महीना बीत गया और प्रतियोगिता का दिन भी आ गया। इस अनोखी प्रतियोगिता को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई।

सभी लोग अपने-अपने प्रतिभागी जानवर को प्रतियोगिता स्थल पर ले आए। चुन्नू भी अपने दोनों खरगोशों को ले आया। गाँव के मुखिया ने दौड़ने का इशारा किया तभी सभी जानवर दौड़ना शुरू कर दिया।

कोई जानवर दौड़ते-दौड़ते खेत की तरफ दौड़ गए, तो कोई जानवर घास खाने लग गए, तो किसी का जानवर आपस में मस्ती करने लगा। मगर चुन्नू का खरगोश जैसे ही प्रतियोगिता स्थल पर कुत्ता को देखा। दोनों खरगोश दौड़ता हुआ सीधा अपने घर में घुस गया।

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चुन्नू के दोनों खरगोशों को मुखिया ने विजयी घोषित किया और साथ में चुन्नू को भी इनाम दिया। मुखिया ने जब इस जीत का कारण पूछा तो चुन्नू ने बड़े ही आराम से कहा कि मेरे दोनों खरगोशों को उसका डर और मेरी सही दिशा में की गई तैयारी ही जीत का कारण है।

शिक्षा : इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अगर मनुष्य अपने अंदर के डर का सामना कर उचित दिशा में लगन के साथ प्रयास करे तो उसे उसकी मंजिल अवश्य मिलती है।

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