हीरों का सच - तेनालीराम की कहानी:

हीरों का सच – तेनालीराम की कहानी | Hiro Ka Sach – Tenalirama Story


Hiro Ka Sach | हीरों का सच – तेनालीराम की कहानी: विजयनगर राज्य के राजा कृष्णदेव राय के दरबार में एक दिन नामदेव नामक व्यक्ति दुखी और परेशान हालत में आया। उस व्यक्ति ने राजा के सामने अपना इंसाफ मांगा। राजा ने उस व्यक्ति को अपने साथ हुई नाइंसाफी बयान करने के लिए कहा। नामदेव ने अपने ऊपर बीती सारी बात बताई। नामदेव ने राजा से कहा कि बीते कल वह और उसका मालिक किसी काम से जा रहे थे कि उसे रास्ते में एक पोटली पड़ी हुई दिखाई दी।

Hiro Ka Sach - Tenalirama Story
Hiro Ka Sach – Tenalirama Story

हीरों का सच – तेनालीराम की कहानी | Hiro Ka Sach – Tenalirama Story

वह पोटली कुछ खास दिखाई दे रही थी। इसलिए मैंने उस पोटली को हाथ में उठाकर टटोला तो उसमें दो चमचमाती हुई हीरे दिखाई दिए। हीरे देखते ही मैंने उसे राज्य के राजकोष में जमा करने की सलाह अपने मालिक को दी। राजकोष में जमा कराने की बात सुनकर मेरे मालिक मुझ पर बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने कहा कि यह बात किसी से भी नहीं बताना है। साथ ही साथ यह भी कहा कि दोनों हीरों को हम दोनों आपस में बाँट लेंगे। एक मैं रखूँगा और एक तुम रखना। हीरे बहुत ही नसीब वालों को मिलते हैं। इसे ऐसे ही नहीं जाने दे सकते हैं।

मालिक के ऐसा कहते ही मेरे मन में भी हीरे रखने की चाहत समा गई। मालिक ने हीरे के साथ मुझे भी अपनी हवेली ले जाने की बात कही और कहा कि वहीं पर इन हीरों का बँटवारा कर लेंगे। मैंने भी उनकी कही बात को उचित समझ कर उनके साथ उनकी हवेली चला गया। जैसे ही हम दोनों हवेली में आए वैसे ही मेरे मालिक हीरे देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि कैसे हीरे! मैं किसी हीरे के बारे में नहीं जानता। तुम अपने घर लौट जाओ। अब आप ही मेरा इंसाफ कीजिए महाराज।

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Hiro Ka Sach – Tenalirama Story: महाराज ने नामदेव की सारी बात बहुत ध्यान से सुना और कहा- तुम्हें अवश्य ही न्याय मिलेगा।महाराज ने नामदेव के मालिक को जल्द ही राज दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। नामदेव का मालिक बहुत ही चालाक और धोखेबाज था। वह तुरंत ही नई चाल चल कर नामदेव को ही फँसाने की बात कहा। नामदेव का मालिक दरबार में हाज़िर हुआ और कहा कि वह हीरे नामदेव को हवेली में आते ही दे दिया था। नामदेव झूठी और मनगढ़ंत बात बताकर मुझे सजा दिलाकर हर्जाना पाने की लालच में है।

मालिक की बात सुनकर महाराज बोले -तुम्हारी बात सच है तो इस बात को दरबार में साबित करो। मालिक बोला- मेरे उन नौकरों को दरबार में बुलाइए जो उस समय वहाँ हवेली में उपस्थित थे। वही सचसच सारी बात बताएंगे कि कौन सच्चा है और कौन झूठा।

महाराज ने उन सभी नौकरों को राज दरबार में उपस्थित होने को कहा। जो उस समय वहाँ मौजूद थे। राजा ने उन नौकरों से पूछा कि हीरे किसके पास है, तो उन सभी ने एक साथ कहा कि हीरे नामदेव के पास है। नौकरों की बात सुनकर महाराज के आगे बड़ा ही असमंजस की हालत पैदा हो गई।

उन्होंने अपने मंत्रियों से सलाह मशविरा किया। किसी मंत्री ने कहा कि नामदेव सच बोल रहा है, तो किसी ने कहा नामदेव का मालिक सच्चा है। मंत्रियों की बात भी महाराज को अंधेरे में रख रहा था, कोई हल नहीं निकल रहा था। इसलिए उन्हें अब तेनालीराम से ही उम्मीद थी कि यह मसला वही सुलझा पाएंगे। महाराज ने तेनालीराम से कहा कि वे इसका हल निकाले।

तेनालीराम बोले कि सच और झूठ का पता अभी चल जाएगा। परंतु इसके लिए आप सभी को परदे के पीछे रहना होगा। तेनालीराम की बात सभी मंत्रियों को कुछ अटपटा सा लगा। मगर महाराज को तेनालीराम पर पूर्ण विश्वास था। इसलिए वे पर्दे के पीछे तुरंत चले गए। बाकी के मंत्री भी पर्दे के पीछे छुप गए।

राज दरबार के कमरे में केवल तेनालीराम थे। उन्होंने राज दरबार के सेवक को आदेश दिया कि वे सभी नौकरों को एक-एक करके मेरे सामने हाजिर करें। उनसे कुछ सवाल पूछना है। तेनालीराम के सामने पहला नौकर हाजिर किया गया। तेनालीराम ने उससे सवाल किया कि क्या तुम्हारे मालिक ने नामदेव को हवेली में आकर हीरे दिए थे? नौकर ने हां में जवाब दिया। तेनालीराम ने उससे कहा क्या तुम उस हीरे का चित्र बनाकर दिखा सकते हो। नौकर सकपकाते हुए बोला- हुजूर मै हीरे का चित्र नहीं बना सकता क्योंकि वह एक पोटली में था।

तेनालीराम ने कहा ठीक है। तुम यही उपस्थित रहो जब तक कि तुम्हें जाने को ना कहा जाए। तेनालीराम ने दुसरे नौकर को हाज़िर होने को कहा। तेनालीराम ने उससे भी वही सवाल दुबारा किया। नौकर ने कहा- हाँ हुज़ूर, मै हीरे का चित्र बना सकता हूँ। नौकर को कागज और दवात दिया गया। नौकर आव देखा न ताव झटपट उस पर गोल-गोल हीरे के समान दो चित्र बना डाले। तेनालीराम ने उसे भी वहीं रुकने को कहा।

तेनालीराम ने तीसरे नौकर को हाजिर होने को कहा। उससे भी वही सवाल किया गया जो पहले के दो नौकरों से किया गया था। नौकर ने कहा- हुजूर हीरा भोजपत्र से बने एक थैली में था। इसलिए मैं उसे नहीं देख सका। तेनालीराम ने उसे भी वहीं रुकने को कहा। तेनालीराम ने महाराज और मंत्रियों को परदे से बाहर आने का अनुरोध किया।

महाराज को देखकर तीनों नौकर डर गए। वह समझ गए थे कि हमारा झूठ पकड़ा गया है। सजा के डर से वे तीनों नौकर ने महाराज से क्षमा मांगी और कहा- हीरों के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता है। मालिक ने जो कहने को कहा था हमने वही कहा। हमें माफ कर दीजिए।

सभी नौकरों की बात सुनकर महाराज ने कहा कि उनके मालिक के घर की तलाशी ली जाए। तभी हीरों के बारे में सच का पता चल पाएगा। महाराज ने तुरंत अपने सैनिकों को उसके घर की तलाशी लेने का आदेश दिया। घर की तलाशी लेने पर दोनों हीरे उनके घर से बरामद किए गए।

मालिक के बेईमानी और झूठ बोलने के कारण एक हजार स्वर्ण मुद्राएं नामदेव को देने पड़े। यह मुद्राएं मालिक के द्वारा नामदेव को देना था तथा बीस हजार स्वर्ण मुद्राएं हर्जाना भी देना पड़ा। बरामद हुए हीरों को राजकोष में जमा करने का आदेश दिया गया।

नामदेव को इंसाफ मिल जाने की वजह से वह बहुत खुश हो गया। वह महाराज और तेनालीराम को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया।


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