तेनालीराम और चोर की कहानी (Tenaliram Aur Chor Ki Kahani): एक समय की बात है। विजयनगर में गर्मी के मौसम के आगमन के साथ ही भीषण गर्मी ने तांडव करना शुरू कर दिया था। चारों तरफ भीषण गर्मी पड़ रही थी। हर तरफ सूखा था। नदी-नाले, तालाब सभी का पानी लगभग सूख चुका था।
एक दिन की बात है। तेनालीराम अपने घर के पीछे बाग में टहल रहा था। उसने देखा कि उसके बगीचा का पेड़-पौधा गर्मी के मार के कारण सूखता जा रहा है। उसके बगीचे में एक कुआं था। परंतु कुएं का पानी इतना नीचे चला गया था कि उससे पानी निकालना बेहद मुश्किल लग रहा था। पेड़-पौधों को पानी कैसे दिया जाए। यही सोचते-सोचते वह कब घर आ गया उसे पता ही नहीं चला।
Tenaliram Aur Chor Ki Kahani | तेनालीराम और चोर की कहानी
एक रात तेनालीराम खाना खाकर सोने ही जा रहा था कि उसे अपने घर के पीछे कुछ हलचल महसूस हुई। उसने अपनी पत्नी को सतर्क रहने के लिए कह कर बाहर सावधानीपूर्वक निरीक्षण करने चला गया। उसने देखा कि दो चोर उसके घर के पीछे बगीचे में छिपे बैठे हैं। वो चोरी करने के मंसूबे बना रहे थे। तेनालीराम तुरंत लौटकर अपनी पत्नी को सारी बात बताई।
तेनालीराम के तीव्र दिमाग ने तुरंत एक योजना बनाई। जिससे उसकी संपत्ति की रक्षा के साथ-साथ बगीचे की सिंचाई भी हो जाए। तेनालीराम थोड़ा तीव्र आवाज में अपनी पत्नी से कहता है- “सुनती हो भाग्यवान, आजकल नगर में काफी चोरियां बढ़ गई है। हमारा धन सुरक्षित रहे इसके लिए हम अपना सारा धन एक संदूक में रख कर घर के पीछे वाले बगीचे में के कुएं में डाल देते हैं। जिससे हमारा धन चोरो से सुरक्षित हो जाएगा”। इतना कह कर तेनालीराम एक संदूक में ईट-पत्थर भरकर अपनी पत्नी की सहायता से कुएं में डाल दिया। चोर यह देखकर काफी खुश हो गया। वे अति प्रसन्न हो रहे थे कि आज उन्हें काफी सारा धन-संपत्ति हाथ लगेगा।
तेनालीराम और उसकी पत्नी काफी खुश होकर अपने घर के अंदर यह कहते हुए चले गए कि अब हम चैन से सो पाएंगे। हमारा धन सुरक्षित हो गया है। आधी रात होने पर दोनों चोर ने अपनी योजना के अनुसार बाल्टी से पानी भर-भर कर पानी कुएं से बाहर निकालने लगे। रात काफी गुजरती जा रही थी परंतु संदूक का कहीं पता नहीं चल पा रहा था। रात भर पानी निकालने की वजह से कुएं से उसके बगीचे की ओर पानी की क्यारियां बन गई थी। इन्हीं क्यारियों से पानी भरकर पूरे बगीचे की सिंचाई हो गई।
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धन पाने के लालच में पानी निकालते-निकालते सुबह होने को आ गई थी। तब जाकर कुएं में संदूक दिखाई पड़ा। चोरों को खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह तुरंत लोहे से बनी झग्गर-कांटा को कुएं में डालकर संदूक को फंसाया और उसे बाहर खींच लिया। चोरों ने जैसे ही संदूक खोला, वे हक्का-बक्का रह गए। उस संदूक में केवल ईंट-पत्थर थे। यह देखकर दोनों चोर अपना सिर पकड़ लिये। इतना ही नहीं सुबह की रोशनी भी होने ही वाली थी। चोरों को यह समझते देर नहीं लगी थी कि तेनालीराम ने उसे मूर्ख बनाया है। पकड़े ना जाए यह सोचकर सिर पर पैर रखकर वे दोनों चोर वहां से भाग खड़े हो गए।
अगले दिन जब तेनालीराम दरबार में महाराज को यह किस्सा सुनाया तो वे हंसे बिना नहीं रह पाए। महाराज बोले आपकी बुद्धिमत्ता का कोई तोड़ नहीं है।
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