Essay on Soil Pollution in Hindi | भूमि प्रदूषण पर निबंध

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Essay on Soil Pollution in Hindi (भूमि प्रदूषण पर निबंध): भूमि में अवांछित पदार्थ जैसे- कूड़े-कचरे, रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ एवं जहरीले तत्वों के मिलने के कारण भूमि की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है। जिसे भूमि प्रदूषण कहते हैं। भूमि प्रदूषण का अर्थ यह है कि जब भूमि पर कूड़ा-कचरा, प्लास्टिक, विषैले पदार्थ इत्यादि पदार्थों को फेंक दिया जाता है तब वहां की भूमि या मिट्टी दूषित हो जाती है। जिसके कारण भूमि की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है, उसे भूमि प्रदूषण कहते हैं।

Essay on Soil Pollution in Hindi | भूमि प्रदूषण पर निबंध
Essay on Soil Pollution in Hindi | भूमि प्रदूषण पर निबंध

भूमि या धरती मनुष्य, पेड़-पौधे, जानवर सभी का आधार है। यह हमारी नीव है अर्थात यह हमारे पर्यावरण का आधार है। धरती का 2% भाग ही कृषि योग्य भूमि है। शेष भाग पठार, मरुस्थल, दलदल, जंगल व खाईयाँ है। एक विशाल जनसंख्या का भरण पोषण करने के लिए मानव फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अत्यधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग करता है। जिसके फलस्वरूप भूमि की प्राकृतिक पोषक क्षमता में काफी कमी आ गई है।

बढ़ती जनसंख्या के कारण अत्यधिक मात्रा में कचरा इकट्ठा होता है। यह कचरा एक विशाल टीले का रूप धारण कर लिया है। यही नहीं बड़े पैमाने पर औद्योगिक इकाइयों से भी कचरा उत्पन्न होता है। जो भूमि में डाल दिया जाता है। जिसके कारण भूमि के बाहरी और आंतरिक दोनों सतहों को काफी नुकसान पहुंचता है।

भूमि पर अनावश्यक जल संचय तथा लापरवाही से घरों से निकलने वाले कूड़े-कचरे को फेंकने से वहां की भूमि प्रदूषित हो जाती है। भूमि पर पड़े कूड़े-कचरे तथा इकट्ठा हुए पानी में जैविक अपघटन होते हैं। जिसके फलस्वरूप वहां पर कीड़े पैदा होने लगते हैं। जमी हुई पानी तथा कुड़े-कचरों के सड़ने से आसपास की जमीन गंदा दिखाई पड़ता है। वहां की भूमि में दुर्गंध पैदा होने लगती है। भूमि प्रदूषण को “मृदा प्रदूषण” भी कहते हैं।

भूमि प्रदूषण के कारण एवं स्रोत | Essay on Soil Pollution in Hindi

घरेलू अपशिष्ट पदार्थ- बढ़ती जनसंख्या एवं महानगरों के कारण घरों से निकलने वाले ठोस अपशिष्ट पदार्थ इसके मुख्य कारण है। अपशिष्ट पदार्थों में अनुपयोगी वस्तुएं जैसे प्लास्टिक, डिब्बे, कागज, गंदे कपड़े, धातु की टुकड़े इत्यादि को खुले मैदानों, सड़कों, गलियों में इधर-उधर फेंक दिए जाते हैं। जिससे धरती प्रदूषित हो जाती।

घरों से निकलने वाले कुड़े-कचरों, रसोई घर से निकलने वाले बचे हुए खाद्य पदार्थ, अन्य सड़े-गले अथवा खराब हो चुके वस्तुओं को किसी जगह पर डाल दिए जाते हैं। जिसके कारण वहां पर कूड़े का ढेर लग जाता है। कुड़े के ढेर लगने से उसमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु पैदा हो जाते हैं। उस पर मक्खियां मंडराने लग जाती हैं। जिसके कारण वहां के आसपास का वातावरण तथा भूमि दूषित हो जाता है।

औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ- बढ़ती हुई कल-कारखानों की संख्या के कारण औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ भी अधिक मात्रा में उत्पन्न हो रहे हैं। कल-कारखानों में उपयोग के बाद निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ को एकत्रित कर किसी स्थान पर डाल दिए जाते हैं या उसे भूमिगत कर दिए जाते हैं। जिसके कारण वहां की धरती या मृदा दूषित हो जाती है। काफी समय तक वहां कुड़े-कचरों के पड़े रहने से मृदा में मौजूद पोषक तत्वों का नाश होने लगता है।

रसायन एवं कीटनाशकों का प्रयोग

खेतों में फसलों की वृद्धि बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग लगातार किया जाता है। जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। भूमि में फसलों की वृद्धि के लिए पोषक तत्वों की कमी होने लगती है। इतना ही नहीं खेतों में पौधों के साथ उगने वाले अवांछित खरपतवार को हटाने के लिए विभिन्न रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। फसलों को बर्बाद करने वाले कीटों को नाश करने के लिए कीटनाशकों का प्रयोग भी लगातार किया जाता है। इनके छिड़काव के दौरान रसायन मृदा में मिलकर भूमि को दूषित कर देते हैं।

जंगलों की कटाई- जंगलों की कटाई करने से भूमि पर पेड़-पौधों की कमी होने लगती है। पेड़-पौधों की कटाई होने से जमीन मैदानी इलाका में बदलने लगता है। जब तेज हवा बहती है या आंधी-तूफान आता है तो हवा अपने साथ धूल-रेत तथा अन्य अवांछित पदार्थ अपने साथ ले आती है। यह सारे पदार्थ धीरे-धीरे मिट्टी की सतह पर एकत्रित हो जाता है। जिसके कारण भूमि दूषित हो जाती है।

अम्लीय वर्षा- वायु में मौजूद हानिकारक तत्व या विषैले गैस वर्षा के साथ धरती पर आता है तो इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। इस वर्षा के पानी में अम्लता और क्षारीयता का गुण मौजूद होता है। जो भूमि की गुणवत्ता के लिए हानिकारक है। अम्लीय वर्षा का पानी मिट्टी में मिलकर मिट्टी को अनुपजाऊ बना देता हैं।

भूमि प्रदूषण के दुष्प्रभाव

भूमि प्रदूषण, मनुष्य और जानवरों दोनों पर समान रूप से अपना दुष्प्रभाव दिखाता है।

स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव- भूमि प्रदूषण होने पर इसका दुष्प्रभाव सर्वप्रथम मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ता है। भूमि पर इधर-उधर कचरा फेंक देने से वहां के वातावरण में दुर्गंध फैल जाता है। वहां पर विभिन्न प्रकार के मच्छर-मक्खियों का जमावड़ा लगने लगता है। मच्छरों के काटने तथा दुर्गंध युक्त वायु हमारे शरीर के अंदर जाकर हमारे शरीर को बीमार कर देता। हमें अनेक प्रकार के त्वचा संबंधी एलर्जी का भी सामना करना पड़ता है।

वातावरण पर दुष्प्रभाव- घरों तथा नगरपालिकाओं द्वारा एकत्रित कचरों में जैविक अपघटन होने लगते हैं। कचोरों का निपटारा नहीं होने से वहां कचरे का टीला बन जाता है। इन कचोरों के टीले से लगातार विषैले रासायनिक गैस तथा तरल पदार्थों का रिसाव होने लगता है ।आस-पास का वातावरण दुर्गंधमय तथा विषाक्त हो जाता है। इन जगहों से गुजरना मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

फसल उत्पादकता पर दुष्प्रभाव- भूमि के प्रदूषित होने से फसलों के उत्पादक क्षमता में काफी कमी आ जाती है। उत्पादक क्षमता में कमी आने के साथ-साथ फसलों में पाए जाने वाले पोषक तत्वों में भी कमी आ जाती है। भूमि की उर्वरा शक्ति कम होने से हमें उच्च कोटि के खाद्य पदार्थ प्राप्त नहीं हो पाते हैं। जिससे हमारे शरीर में कई प्रकार के पोषक तत्वों की कमी आ जाती है।

घरेलू जानवरों पर दुष्प्रभाव- सड़कों, गलियों में फेंके गए कचरे मनुष्य के साथ-साथ जानवरों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। सड़कों, गलियों में घूमते हुए जानवर अपने भोजन की तलाश इन्हें कचरा में करते हैं। इन कचोरों में बेकार बचे हुए भोजन के साथ-साथ अन्य रासायनिक पदार्थ, धातु के टुकड़े, शीशे, कील, प्लास्टिक भी सम्मिलित रहते हैं। जो जानवरों में भोजन के साथ-साथ सारे हानिकारक वस्तुएं भी उनके पेट में चले जाने की आशंका बनी रहती है। जिससे उनकी जान को खतरा हो सकता है।

भूमि प्रदूषण के रोकने के उपाय

  • कृषि क्षेत्रों में फसलों की उपज को बढ़ाने के लिए जैविक खेती का अनुसरण करना चाहिए। रासायनिक तत्वों के इस्तेमाल की जगह खाद, उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए। रसायनिक कीटनाशकों की जगह जैविक कीट नियंत्रक का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • भूमि की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने के लिए जैविक खाद, गोबर से बने खाद, सब्जियों तथा फलों के छिलकों, सूखी पत्तियों ,चाय की पत्तियों, बचे हुए भोजन को मिलाकर कंपोस्ट खाद तैयार करना चाहिए। इन जैविक खाद तथा कंपोस्ट खाद को समय-समय पर खेतों में डालते रहना चाहिए।
  • हमें सुखी और गीले कचरे को अलग-अलग करके कूड़ेदान में डालना चाहिए ताकि सूखे कचरे को पुनः उपयोग में लाया जा सके।
  • हमें प्लास्टिक से बने थैलियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। प्लास्टिक की बनी थैली के बजाय कागज तथा कपड़ों से बनी थैली का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • मिट्टी का संरक्षण तथा ज्यादा-से-ज्यादा पेड़-पौधे लगाकर भूमि की उर्वरा शक्ति को बरकरार रख सकते हैं।
  • घर तथा रसोई घर से निकले हुए कचरे को सड़कों तथा गलियों में न फेंककर हम भूमि प्रदूषण से बच सकते है।

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